क्या था ‘धरमत का युद्ध’? (What was the ‘Battle of Dharmat’?) : डेली करेंट अफेयर्स

हाल ही में, ‘Battle of Dharmat’ विषय पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय द्वारा दारा शिकोह पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन का विषय था ”दारा शिकोह क्यों आज भी मायने रखते हैं: उनकी शख्सियत और उनके कार्यों की याद”। इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी भी मौजूद थे। कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि सामाजिक सद्भाव, सौहार्द, सहिष्णुता, सर्वधर्म सम्भाव भारत की आत्मा है और ”एकता में अनेकता” भारत की ताकत है और दारा शिकोह जीवनपर्यन्त इसी संस्कृति और संस्कार के सार्थक सन्देश वाहक रहे।

दारा शिकोह मुगल सम्राट शाहजहाँ का सबसे बड़े बेटे थे। इनका जन्म साल 1615 ई॰ में और मृत्यु 1659 ई॰ में हुई थी। शाहजहाँ दारा शिकोह को ही अपना राजपद देना चाहता था, लेकिन उत्तराधिकार के संघर्ष में दाराशिकोह के भाई औरंगज़ेब ने उनकी हत्या कर दी थी। दारा शिकोह और औरंगजेब के बीच जो लड़ाई हुई थी उसे ‘धरमत का युद्ध’ कहा जाता है। बताया जाता है कि औरंगजेब द्वारा हराए जाने के बाद दारा शिकोह को जंजीरों में बाँधकर दिल्ली लाया गया। उसके बाद, उसका सिर काट कर आगरा किले में शाहजहाँ के पास भेज दिया गया, जबकि उसके धड़ को हुमायूँ के मकबरे के परिसर में कहीं दफना दिया गया था।

साल 2020 में संस्कृति मंत्रालय द्वारा मुगल शहज़ादे दारा शिकोह की कब्र का पता लगाने के लिये एक कमेटी गठित की गई। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI के निदेशक टीजे अलोने की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी में जाने-माने पुरातत्ववेत्ता आर. एस. बिष्ट, सैयद जमाल हसन, के. एन. दीक्षित, बीआर मणि, के. के. मुहम्मद, सतीश चंद्रा और बी. एम. पाण्डेय शामिल थे। इसी बीच जनवरी 2021 में दक्षिणी दिल्ली नगर निगम की हेरिटेज सेल में तैनात एक सहायक अभियंता संजीव कुमार सिंह ने दारा शिकोह की कब्र खोजने का दावा किया। उन्होंने ये दावा साल 1688 में मिर्जा काजिम द्वारा फारसी भाषा में लिखे गए ‘आलमगीरनामा’ पुस्तक के आधार पर की है। कुछ इतिहासकार संजीव कुमार से सहमत नहीं हैं, लेकिन ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि संजीव की बात सही है। कला और स्थापत्य की दृष्टि से भी उनके तथ्य सही साबित हुए हैं। इसी के आधार पर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट एएसआई को सौंप दी है।

Dara Shikoh Battle of Dharmat क्या था ‘धरमत का युद्ध’?

बता दें कि दारा शिकोह को हुमायूँ के मकबरे के परिसर में जिस जगह दफनाया गया था, वहां मुगल वंश की तकरीबन 140 कब्रें हैं। दारा शिकोह की सही कब्र का पता लगाने में ASI के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस परिसर में मौजूद कब्रों पर किसी का नाम नहीं लिखा है। निश्चित तौर पर ASI इस बारे में जरूरी शोध, रिसर्च और अध्ययन करेगी, ताकि किसी प्रमाणिक नतीजे तक पहुँचा जा सके।

इतिहास में दारा शिकोह की छवि एक ‘उदार मुस्लिम’ के रूप में बताई जाती है, और कहा जाता है कि इसने हिंदू और इस्लामी परंपराओं के बीच समानताएँ खोजने की कोशिश की। दारा शिकोह ने अपने समय के संस्कृत के अच्छे विद्वानों और सूफी संतों से वेदांत और इस्लाम के दर्शन का गहन ज्ञान हासिल किया था। इसके अलावा, इसने फारसी और संस्कृत में इन दोनों दर्शनों की समान विचारधारा को लेकर अनेक पुस्तकें लिखीं। फारसी में लिखी गई ‘मज्म-उल्-बहरैन्’ उसकी बेहतरीन रचनाओं में से एक है। इस किताब में दारा शिकोह ने इस्लाम और वेदांत की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बताई हैं। साथ ही, इसने ‘समुद्रसंगम’ नामक संस्कृत में भी एक रचना की थी। इसके अलावा, दारा शिकोह ने 52 उपनिषदों का अनुवाद ‘सिर्र-ए-अकबर’ नाम से किया था। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ का भी फारसी भाषा में अनुवाद किया था।

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