पशुधन के लिये मोबाइल पशु चिकित्सक-इकाइयाँ (Mobile Vet Units for Livestock)

 

संदर्भ 

यह एडिटोरियल 18/01/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Just What The Doctor Ordered For The Livestock Farmer” लेख पर आधारित है। इसमें भारत में पशुधन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के संबंध में चर्चा की गई है। बीसवीं पशुधन गणना के अनुसार, भारत में वर्तमान में पशुधन आबादी लगभग 537 मिलियन है, जिनमें से 95.8% ग्रामीण क्षेत्रों में संकेंद्रित है।

चूँकि देश की अधिकांश पशुधन आबादी ग्रामीण और दूरदराज़ के क्षेत्रों में संकेंद्रित है, ऐसे में पशु चिकित्सा सेवाओं तक पहुँच एक बड़ी चुनौती है। पशुपालकों को अपने पशुओं की उपचार आवश्यकताओं हेतु  प्रायः अपने गाँवों से दूर जाना पड़ता है। इससे उनके पशुधन की लंबी आयु और उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

पशु चिकित्सा सेवाओं तक पहुँच की समस्या को दूर करने के लिये सरकार ने किसानों को घर तक सेवाएँ (doorstep services) प्रदान करने के उद्देश्य से मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (Mobile Veterinary Units- MVUs) की सुविधा शुरू की है। इस महत्त्वपूर्ण पहल के साथ ही निकट भविष्य में मुख्य ध्यान पशु चिकित्सा स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के उन्नयन, रोग निगरानी एवं प्रशिक्षण (CVE) और वास्तविक समय में रोगों की रिपोर्टिंग पर केंद्रित होगा।

पशुधन स्वास्थ्य और संबंधित पहल

  • पशुपालन (Animal Husbandry) भारतीय कृषि का अभिन्न अंग है जो लगभग 55% ग्रामीण आबादी को आजीविका उपलब्ध कराता है। उल्लेखनीय है कि भारत में विश्व की सर्वाधिक पशुधन आबादी मौजूद है।
    • भारत को दूध आपूर्ति का लगभग 70% उन किसानों से प्राप्त होता है जिनके पास संख्या में पाँच से कम पशु हैं।
      • हालाँकि स्तनशोथ/‘बोवाइन मैस्टाइटिस’(Bovine Mastitis) जैसी समस्याओं से प्रतिदिन लगभग 10 लीटर प्रतिफार्म दूध की हानि होती है जो लगभग 300-350 रुपए प्रति दिन की हानि के बराबर है।
      • इस प्रकार अधिकांश किसानों के लिये पशुओं का बीमार होना या फिर उनकी मृत्यु जीविका और भुखमरी से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
    • पशु स्वास्थ्य की समस्या ग्रामीण समुदायों में दवा वितरकों के सेल्समैनों की बढ़ती उपस्थिति से भी जटिल हुई है।
  • पशुधन के लिये सरकार की विभिन्न पहल:
    • राष्ट्रीय गोकुल मिशन (Rashtriya Gokul Mission): गोजातीय आबादी की स्वदेशी नस्लों के विकास एवं संरक्षण और दूध उत्पादन में वृद्धि के साथ इसे किसानों के लिये अधिक लाभकारी बनाने के लिये इस मिशन को शुरू किया गया।
    • राष्ट्रीय पशुधन मिशन (National Livestock Mission): पशुधन उत्पादन प्रणालियों में मात्रात्मक एवं गुणात्मक सुधार सुनिश्चित करने और सभी हितधारकों के क्षमता निर्माण से संबंधित।
    • राष्ट्रीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम (National Artificial Insemination Programme): इस कार्यक्रम के अंतर्गत मादा नस्लों में गर्भधारण के नए तरीकों का सुझाव दिया जाएगा।
      • इसमें कुछ लैंगिक बीमारियों के प्रसार को रोकना भी शामिल है, ताकि नस्ल की दक्षता में वृद्धि की जा सके।
  • पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम में सुधार: सरकार ने ‘पशु चिकित्सा सेवाओं की स्थापना और सुदृढ़ीकरण मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (MVUs)’ को शामिल कर इस कार्यक्रम के प्रावधानों को संशोधित किया है।
    • एक सामान्य पशु चिकित्सा इकाई (MVU) चार-पहिया वाहन होता है, जिसमें एक पशु चिकित्सक, एक पैरा-पशु चिकित्सक और एक चालक-सह-परिचारक के लिये कार्य करने की जगह होती है।
      • इसे ‘डोरस्टेप डिलीवरी मॉडल’ पर कार्यान्वित किया जाएगा।
    • इस वाहन में निदान, उपचार एवं मामूली सर्जरी के लिये उपकरण, पशुओं के इलाज हेतु अन्य बुनियादी चीज़ों, जागरूकता के प्रसार के लिये ऑडियो-विजुअल उपकरण एवं वाहनों की जीपीएस ट्रैकिंग जैसी आवश्यक सुविधाओं के लिये जगह बनाई गई है।

पशुधन स्वास्थ्य से संबद्ध चुनौतियाँ

  • अपर्याप्त परीक्षण: मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति ने पाया है कि पशु रोगों के लिये परीक्षण और उपचार सुविधाओं की अपर्याप्तता या कमी एक बड़ी चुनौती है।
    • यह समस्या वर्तमान परिदृश्य में और भी विकट हो गई है जहाँ पशुजन्य रोगों के मामलों में भारी वृद्धि हो रही है।
  • अप्रशिक्षित पशु स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता: ग्रामीण भारत में अप्रशिक्षित पशु स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता ही अधिक लोकप्रिय हैं क्योंकि वे परामर्श के लिये कम शुल्क लेते हैं और आसानी से उपलब्ध होते हैं।
    • इससे विशेष रूप से मैस्टाइटिस रोग के मामलों में त्रुटिपूर्ण नुस्खे के कारण एंटीबायोटिक दवाओं के अनुचित उपयोग की संभावना बनी होती है।
  • AMR में वृद्धि: रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance- AMR) से संबंधित समस्याएँ तब उत्पन्न होती हैं जब पशुओं पर आरंभ में असरकारक रही  किसी दवा का असर बाद में होना बंद हो जाता है।
    • दवा की अधिक या कम मात्रा, गलत अवधि तक के लिये दवा का सेवन और ‘ओवरप्रिस्क्रिप्शन’ (Overprescription) जैसे कारकों से AMR की स्थिति उत्पन्न होती है।
  • ऋण प्राप्त करने में समस्याएँ: एम.के. जैन समिति की रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि विशेष रूप से ऋण और पशुधन बीमा तक पहुँच के मामले में पशुपालक किसानों को पारंपरिक कृषकों की तुलना में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
    • ऋण की उपलब्धता की कमी भी किसानों को अपने पशुओं के लिये पशु चिकित्सा सेवाओं का उपयोग करने के प्रति हतोत्साहित करती है।

आगे की राह 

  • AMR को कम करना: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी “प्राथमिकता रोगजनकों” को सूचीबद्ध किया है; यह जीवाणुओं की 12 प्रजातियों/परिवारों की सूची है जो मानव स्वास्थ्य के लिये सर्वाधिक खतरा उत्पन्न करती हैं।
    • MVU मॉडल रोगाणुरोधी प्रतिरोध की समस्या को कम करेगा और यह WHO की वैश्विक कार्य योजना द्वारा निर्धारित ‘वन हेल्थ विज़न’ (One Health Vision) के अनुरूप है।
  • पशुधन के लिये MVUs: पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण योजना में प्रति एक लाख पशुओं पर एक MVU की परिकल्पना की गई है हालाँकि दुर्गम इलाकों में प्रयुक्त गाड़ियों की संख्या अधिक भी हो सकती है।
    • MVUs की उपलब्धता पर्याप्त संख्या में सुनिश्चित की जानी चाहिये (यहाँ तक कि दुर्गम क्षेत्रों में भी) ताकि भौगोलिक स्थिति बेहतर पशु चिकित्सा सेवाओं की पहुँच में बाधा न बने।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: पशु स्वास्थ्य और MVUs के संदर्भ में निजी क्षेत्र द्वारा नवाचारों और हस्तक्षेप के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं।
    • कोविड-19 महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन के समय स्टार्टअप कंपनियों के नवाचार देखने को मिले। पशुपालक किसानों एवं पशु चिकित्सकों के मध्य वीडियो परामर्श सत्र के आयोजन हुए, साथ ही मोबाइल ऐप के माध्यम से पशुधन स्वास्थ्य एवं पोषण पर किसानों को विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई गई।
    • इसके अतिरिक्त सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के बढ़ते चलन के साथ MVU मॉडल निवेश पर उच्च रिटर्न का सृजन किया जा सकता है।

 प्रश्न: ग्रामीण भारत में पशुपालक किसानों के समक्ष विद्यमान चुनौतियों की चर्चा कीजिये।