krishna water dispute

कृष्णा जल विवाद krishna water dispute

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के दो जजों ने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच कृष्णा नदी जल  के बँटवारे के विवाद से जुड़े एक मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है।

  • उन्होंने इसका कारण बताया कि वे पक्षपात का निशाना नहीं बनना चाहते क्योंकि विवाद उनके गृह राज्यों से संबंधित है।

न्यायाधीशों का बहिष्कार

  • यह पीठासीन न्यायालय के अधिकारी या प्रशासनिक अधिकारी के हितों के टकराव के कारण कानूनी कार्यवाही जैसी आधिकारिक कार्रवाई में भाग लेने से अनुपस्थित रहने से संबंधित है।
  • जब हितों का टकराव होता है तो एक न्यायाधीश मामले की सुनवाई से पीछे हट सकता है ताकि यह धारणा पैदा न हो कि उसने मामले का निर्णय करते समय पक्षपात किया है।
  • पुनर्मूल्यांकन को नियंत्रित करने वाले कोई औपचारिक नियम नहीं हैं, हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों में इस मुद्दे पर बात की गई है।
    • रंजीत ठाकुर बनाम भारत संघ (1987) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यह दूसरे पक्ष के मन में पक्षपात की संभावना की आशंका के प्रति तर्कों को बल प्रदान करती है।
    • न्यायालय को अपने सामने मोजूद पक्ष के तर्क को देखना चाहिये और तय करना चाहिये कि वह पक्षपाती है या नहीं।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • वर्ष 2021 में आंध्र प्रदेश ने आरोप लगाया कि तेलंगाना सरकार द्वारा उसे “असंवैधानिक और अवैध” तरीके से पीने एवं सिंचाई के लिये पानी के अपने वैध हिस्से से वंचित कर दिया गया।
    • श्रीशैलम जलाशय का पानी, जो कि दोनों राज्यों के बीच नदी के जल का मुख्य भंडारण है, संघर्ष का एक प्रमुख बिंदु बन गया है।
      • आंध्र प्रदेश ने तेलंगाना द्वारा बिजली उत्पादन हेतु श्रीशैलम जलाशय के पानी के उपयोग का विरोध किया।
      • श्रीशैलम जलाशय आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी पर बनाया गया है। यह नल्लामाला पहाड़ियों में स्थित है।
    • इसने आगे तर्क दिया कि तेलंगाना, आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के तहत गठित शीर्ष परिषद में लिये गए निर्णयों, इस अधिनियम के तहत गठित कृष्णा नदी प्रबंधन बोर्ड (केआरएमबी) के निर्देशों और केंद्र के निर्देशों का पालन करने से इनकार कर रहा है।
  • पृष्ठभूमि:
    • कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण:
      • वर्ष 1969 में ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956’ के तहत कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT) को स्थापित किया गया था और इसने वर्ष 1973 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।
      • साथ ही यह भी निर्धारित किया गया था कि ‘कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण’ आदेश की समीक्षा या संशोधन किसी सक्षम प्राधिकारी या न्यायाधिकरण द्वारा 31 मई, 2000 के बाद किसी भी समय किया जा सकता है।
    • दूसरा कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण
      • वर्ष 2004 में दूसरे कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना की गई जिसने वर्ष 2010 में अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की। वर्ष 2010 में दिये गए निर्णय में अधिशेष जल का 81 TMC महाराष्ट्र को, 177 TMC कर्नाटक को तथा 190 TMC आंध्र प्रदेश के लिये आवंटित किया गया था।
    • KWDT की वर्ष 2010 की रिपोर्ट के बाद:
      • आंध्र प्रदेश ने वर्ष 2011 में सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से इसे चुनौती दी थी।
      • वर्ष 2013 में कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण ने ‘आगे की रिपोर्ट’ जारी की, जिसे वर्ष 2014 में आंध्र प्रदेश ने फिर से सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।
    • तेलंगाना का निर्माण:
      • तेलंगाना के निर्माण के बाद आंध्र प्रदेश ने कहा है कि तेलंगाना को KWDT में एक अलग पक्ष के रूप में शामिल किया जाए और कृष्णा जल के आवंटन को तीन के बजाय चार राज्यों के बीच फिर से वितरित किया जाए।
        • यह आंध्र प्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2014 की धारा 89 पर आधारित है।
        • इस खंड के प्रयोजनों हेतु, यह स्पष्ट किया जाता है कि नियत दिन को या उससे पहले ट्रिब्यूनल द्वारा पहले से किये गए परियोजना-विशिष्ट आवंटन संबंधित  राज्यों पर बाध्यकारी होंगे।
  • संवैधानिक प्रावधान:
    • अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद के निपटारे हेतु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 में प्रावधान है।
      • इसके तहत संसद किसी भी अंतर्राज्यीय नदी और नदी घाटी के जल उपयोग, वितरण एवं नियंत्रण के संबंध में किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान कर सकती है।
    • संसद ने दो कानून, नदी बोर्ड अधिनियम (1956) और अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956) अधिनियमित किये हैं।
      • नदी बोर्ड अधिनियम (River Boards Act) अंतर-राज्यीय नदी और नदी घाटियों के नियमन एवं विकास हेतु केंद्र सरकार द्वारा नदी बोर्डों की स्थापना का प्रावधान करता है।
      • अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम (Inter-State Water Disputes Act) केंद्र सरकार को एक अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के संबंध में दो या दो से अधिक राज्यों के मध्य विवाद के निर्णय हेतु  एक तदर्थ न्यायाधिकरण स्थापित करने का अधिकार प्रदान करता है।
        • किसी भी जल विवाद के संबंध में न तो सर्वोच्च न्यायालय और न ही किसी अन्य न्यायालय के पास अधिकार क्षेत्र है, जिसे इस अधिनियम के तहत ऐसे न्यायाधिकरण को संदर्भित किया जा सकता है।

कृष्णा नदी:

  • स्रोत: इसका उद्गम महाराष्ट्र में महाबलेश्वर (सतारा) के निकट होता है। यह गोदावरी नदी के बाद प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे बड़ी नदी है।
  • ड्रेनेज: यह बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले चार राज्यों महाराष्ट्र (303 किमी), उत्तरी कर्नाटक (480 किमी) और शेष 1300 किमी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में प्रवाहित होती है।
  • सहायक नदियाँ: तुंगभद्रा, मल्लप्रभा, कोयना, भीमा, घटप्रभा, येरला, वर्ना, डिंडी, मुसी और दूधगंगा।

 

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आगे की राह

  • जल विवादों का समाधान या संतुलन तभी किया जा सकता है जब ट्रिब्यूनल द्वारा दिये गए निर्णयों पर सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार के साथ एक स्थायी ट्रिब्यूनल स्थापित किया जाए।
  • किसी भी संवैधानिक सरकार का तात्कालिक लक्ष्य अनुच्छेद 262 में संशोधन और अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम में संशोधन तथा उसका समान रूप से क्रियान्वयन होना चाहिये।
  • यह समय है कि हम सभी को जल प्रबंधन के बारे में अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिये, न केवल राज्यों के भीतर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अगले 30 वर्षों में जल परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए आम सहमति के लिये संचार के चैनलों में सख्ती से सुधार करने की ज़रूरत है।
  • तंत्र को इस तरह से सुधारना चाहिये कि केंद्र द्वारा बनाए गए निकाय को राज्यों के हितों की रक्षा के लिये पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व मिले।

 

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